(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्रमवासिकपर्व - अध्याय 041


॥ श्रीः ॥
16.22. अध्यायः 022
अथाश्रमवासपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - AshramaVasika Parva - Chapter Topics
शतयूपपृष्टेन नारदेन तंप्रति धृतराष्ट्रस्य वर्षत्रयादूर्ध्वं गान्धार्या सह कुबेरलोकप्राप्तिकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - AshramaVasika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

नारदस्य तु तद्वाक्यं शशंसुर्द्विजसत्तमाः।
शतयूपस्तु राजर्षिर्नारदं वाक्यमब्रवीत्॥ 16-22-1(97769)
अहो भगवता श्रद्धा कुरुराजस्य वर्धिता।
सर्वस्य च जनस्यास्य मम चैव महाद्युते॥ 16-22-2(97770)
अस्ति काचिद्विवक्षा तु तां मे निगदतः शृणु।
धृतराष्ट्रं प्रति नृपं देवर्षे लोकपूजित॥ 16-22-3(97771)
सर्ववृत्तान्ततत्त्वज्ञो भवान्दिव्येन चक्षुषा।
युक्तः पश्यसि विप्रर्षे गतयो विविधा नृणाम्॥ 16-22-4(97772)
उक्तवान्नृपतीनां त्वं महेन्द्रस्य सलोकताम्।
न त्वस्य नृपतेर्लोकाः कथितास्ते महामुने॥ 16-22-5(97773)
स्थानमप्यस्य नृपतेः श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो।
त्वत्तः कीदृक्कदा चेति तन्ममाख्याहि तत्त्वतः॥ 16-22-6(97774)
इत्युक्तो नारदस्तेन वाक्यं सर्वमनोनुगम्।
व्याजहार सभामध्ये दिव्यदर्शी महातपाः॥ 16-22-7(97775)
नारद उवाच। 16-22-8x(8050)
यदृच्छया शक्रसदो गत्वा शक्रं शचीपतिम्।
दृष्टवानस्मि राजर्षे तत्र पाण्डुं नराधिपम्॥ 16-22-8(97776)
तत्रेयं धृतराष्ट्रस्य कथा समभवन्नप।
तपसो दुष्करस्यास्य यदयं तपते नृपः॥ 16-22-9(97777)
तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम्।
वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोस्य परमायुषः॥ 16-22-10(97778)
ततः कुबेरभवनं गान्धारीसहितो नृपः।
प्रयाता धृतराष्ट्रोऽयं राजराजाभिसत्कृतः॥ 16-22-11(97779)
कामगेन विमानेन दिव्याभरणभूषितः।
ऋषिपुत्रो महाभागस्तपसा दग्धकिल्बिषः॥ 16-22-12(97780)
सञ्चरिष्यति लोकांश्च देवगन्धर्वरक्षसाम्।
स्वच्छन्देनेति धर्मात्मा व्यासस्य तु तपोबलात्॥ 16-22-13(97781)
देवगुह्यमिदं प्रीत्या मया वः कथितं महत्।
भवन्तो हि श्रुतधनास्तपसा दग्धकिल्बिषाः॥ 16-22-14(97782)
वैशम्पायन उवाच। 16-22-15x(8051)
इति ते तस्य तच्छ्रुत्वा देवर्षेर्मधुरं वचः।
सर्वे सुमनसः प्रीता बभूवुः स च पार्थिवः॥ 16-22-15(97783)
एवं कथाभिरन्वास्य धृतराष्ट्रं मनीषिणः।
विप्रजग्मुर्यथाकामं ते सिद्धगतिमास्थिताः॥ ॥ 16-22-16(97784)

इति श्रीमन्महाभारते आश्रमवासिकपर्वणि आश्रमवासपर्वणि द्वाविंशोऽध्यायः॥ 22 ॥

Mahabharata - AshramaVasika Parva - Chapter Footnotes
7-22-12 ऋषिपुत्रो व्यासपुत्रः॥


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